प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना: खेत से खुशहाली तक — भारत के किसान का नया सवेरा

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना क्या है

यह योजना भारत सरकार की एक नई पहल है। इसका सीधा मकसद आपकी खेती को मुनाफे में बदलना है। आप अपने खेत में दिन-रात मेहनत करते हैं। सरकार चाहती है कि आपको उस मेहनत का पूरा दाम मिले। यह योजना सिर्फ फसल उगाने तक सीमित नहीं है। यह आपको बीज खरीदने से लेकर फसल बेचने तक मदद करती है। सरकार आपके बैंक खाते में सीधे पैसा भेजती है। आपको खाद और बीज के लिए साहूकार के पास जाने की जरूरत नहीं है। यह योजना खेती की लागत को कम करती है। आप आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। सरकार आपको इन मशीनों पर भारी छूट देती है। इसका लक्ष्य आपको आत्मनिर्भर बनाना है। आप अपनी फसल को सही दाम पर बेच पाएंगे। मंडी में आपको इंतजार नहीं करना पड़ेगा। यह योजना आपके परिवार की सुरक्षा भी सुनिश्चित करती है। इसमें फसल खराब होने पर मुआवजे का प्रावधान है। आप बेफिक्र होकर खेती कर सकते हैं।

इस योजना का नाम “धन-धान्य” क्यों रखा गया

इस नाम में ही योजना का पूरा मतलब छिपा है। धन का मतलब है पैसा और संपत्ति। धान्य का मतलब है अनाज और फसल। सरकार जानती है कि किसान के पास अनाज तो होता है पर नकद पैसा कम होता है। यह योजना इन दोनों चीजों को जोड़ती है। आपके घर में अनाज का भंडार होना चाहिए। आपकी जेब में पैसा भी होना चाहिए। जब ये दोनों चीजें मिलेंगी तभी असली खुशहाली आएगी। पुराना समय अलग था। तब सिर्फ पेट भरने के लिए खेती होती थी। अब खेती एक व्यापार है। आपको अपनी उपज से धन कमाना है। यह नाम आपको याद दिलाता है कि आपका लक्ष्य क्या है। सरकार चाहती है कि आप समृद्ध बनें। इसलिए इस योजना का नाम धन-धान्य रखा गया है। यह नाम आपकी मेहनत और उसके फल का प्रतीक है।

यह योजना बाकी सरकारी योजनाओं से अलग कैसे है

पुरानी योजनाओं में कागज का काम बहुत ज्यादा होता था। आपको दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे। इस योजना में सब कुछ आसान कर दिया गया है। आप अपने मोबाइल से ही आवेदन कर सकते हैं। पहले पैसा आने में महीनों लग जाते थे। अब पैसा तुरंत आपके खाते में आता है। दूसरी योजनाएं अक्सर बड़े किसानों के लिए होती थीं। यह योजना छोटे किसानों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इसमें बीच में कोई दलाल नहीं है। आपका पैसा सीधे आप तक पहुंचता है। पुरानी योजनाओं में सिर्फ नुकसान होने पर मदद मिलती थी। यह योजना नुकसान होने से पहले ही आपको तैयार करती है। सरकार आपको मौसम की जानकारी पहले ही दे देती है। आपको मिट्टी की जांच की सुविधा मिलती है। यह योजना एक पूरे पैकेज की तरह काम करती है। इसमें खेती के हर हिस्से पर ध्यान दिया गया है।

कितने साल तक चलेगी धन-धान्य कृषि योजना

सरकार ने इसे लंबी अवधि के लिए बनाया है। खेती में बदलाव एक दिन में नहीं आता। यह योजना अगले पांच साल तक लगातार चलेगी। सरकार ने इसके लिए बड़ा बजट तैयार किया है। आपको यह डरने की जरूरत नहीं है कि योजना बीच में बंद हो जाएगी। यह हर साल रिन्यू होगी। सरकार इसके नतीजों को देखेगी और इसे और बेहतर बनाएगी। आप आज इससे जुड़ेंगे तो सालों तक फायदा उठाएंगे। इसका मकसद खेती को हमेशा के लिए मजबूत करना है। यह कोई चुनावी वादा नहीं है। यह एक ठोस सरकारी नीति है। समय के साथ इसमें नई सुविधाएं भी जुड़ती जाएंगी। आप इस योजना को अपने भविष्य का हिस्सा मान सकते हैं।

किन किसानों को इसका सबसे ज़्यादा फायदा मिलेगा

इस योजना के केंद्र में छोटा किसान है। अगर आपके पास थोड़ी जमीन है तो यह योजना आपके लिए है। जिन किसानों के पास सिंचाई के साधन नहीं हैं उन्हें सबसे ज्यादा लाभ होगा। जो किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं उन्हें राहत मिलेगी। आप अगर बटाई पर खेती करते हैं तो भी आपको मदद मिलेगी। महिला किसानों को सरकार ने खास जगह दी है। जो युवा खेती में अपना भविष्य देख रहे हैं उन्हें भी फायदा होगा। आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों के किसानों पर विशेष ध्यान दिया गया है। अगर आप परंपरागत खेती छोड़कर कुछ नया करना चाहते हैं तो सरकार मदद करेगी। सब्जी और फल उगाने वाले किसानों को भी इसमें शामिल किया गया है। यह योजना हर उस किसान के लिए है जो आगे बढ़ना चाहता है।

इस योजना को शुरू करने का असली मकसद

सरकार का एकमात्र उद्देश्य किसान को ताकतवर बनाना है। भारत की अर्थव्यवस्था खेती पर टिकी है। अगर आप कमजोर होंगे तो देश कमजोर होगा। सरकार चाहती है कि खेती घाटे का सौदा न रहे। यह योजना आपको सम्मान से जीने का मौका देती है। इसका मकसद सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं है। असली मकसद आपकी जेब में पैसा डालना है। सरकार गांवों से पलायन रोकना चाहती है। जब गांव में रोजगार होगा तो शहर नहीं भागना पड़ेगा। यह योजना खाद्य सुरक्षा को भी पक्का करती है। देश के पास अनाज का भंडार भरा रहना चाहिए। सरकार आपको आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। आप किसी के आगे हाथ न फैलाएं। यही इस योजना की नींव है।

कम उपज वाले इलाकों पर फोकस क्यों किया गया

देश के कई हिस्सों में खेती पिछड़ गई है। कुछ जगह पानी की कमी है। कुछ जगह मिट्टी खराब हो चुकी है। सरकार ने इन कमजोर इलाकों को चुना है। इसका कारण साफ है। विकास सब जगह एक जैसा होना चाहिए। अगर एक राज्य आगे बढ़ेगा और दूसरा पीछे रह जाएगा तो संतुलन बिगड़ जाएगा। इन इलाकों में गरीबी ज्यादा है। यहाँ के किसानों को मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है। सरकार यहाँ नई तकनीक ला रही है। कम पानी में ज्यादा फसल उगाने के तरीके सिखाए जा रहे हैं। इन इलाकों की मिट्टी की जांच मुफ्त हो रही है। सरकार चाहती है कि यहाँ की जमीन फिर से सोना उगले। पिछड़े इलाकों को मुख्य धारा में लाना ही लक्ष्य है।

किसानों की आमदनी बढ़ाने की पूरी सोच

आमदनी बढ़ाने का गणित सीधा है। सरकार दो तरफ से काम कर रही है। पहला काम है लागत कम करना। खाद और बीज सस्ते मिलेंगे तो आपका खर्चा बचेगा। दूसरा काम है फसल का सही दाम दिलाना। जब खर्चा कम होगा और दाम ज्यादा मिलेगा तो मुनाफा अपने आप बढ़ेगा। सरकार बिचौलियों को हटा रही है। आप अपनी फसल सीधे कंपनियों को बेच सकते हैं। सरकार फूड प्रोसेसिंग पर भी जोर दे रही है। आप टमाटर बेचने के बजाय केचप बनाकर बेचें। आलू के बजाय चिप्स का कारखाना लगाएं। इससे आपकी कमाई कई गुना बढ़ जाएगी। सरकार इसके लिए सस्ता लोन दे रही है। यह सोच खेती को सिर्फ खेती नहीं बल्कि बिजनेस बनाने की है।

फसल विविधिकरण पर सरकार इतना ज़ोर क्यों दे रही है

एक ही फसल बार-बार उगाने से जमीन खराब होती है। मिट्टी की ताकत कम हो जाती है। सरकार चाहती है कि आप बदल-बदल कर खेती करें। इसे ही फसल विविधिकरण कहते हैं। बाजार में मांग बदल रही है। लोग अब मोटे अनाज और फल-सब्जियां ज्यादा खा रहे हैं। अगर आप गेहूं-धान ही उगाते रहेंगे तो दाम कम मिलेगा। नई फसलों के दाम बाजार में ज्यादा हैं। अलग-अलग फसल उगाने से जोखिम कम होता है। अगर एक फसल खराब हुई तो दूसरी से भरपाई हो जाती है। यह आपकी सुरक्षा के लिए है। सरकार इसके लिए आपको नए बीज देती है। आपको ट्रेनिंग भी दी जाती है। बदलाव ही मुनाफे का रास्ता है।

जलवायु बदलाव और खेती: योजना कैसे मदद करेगी

मौसम अब भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बेमौसम बारिश होती है तो कभी सूखा पड़ता है। गर्मी बढ़ रही है। यह खेती के लिए बड़ा खतरा है। यह योजना आपको इस खतरे से लड़ने में मदद करती है। सरकार ऐसे बीज तैयार कर रही है जो गर्मी और कम पानी में भी उग सकें। इसे ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट’ खेती कहते हैं। आपको मौसम की सटीक जानकारी पहले ही मिल जाएगी। इससे आप अपनी बुवाई का समय बदल सकते हैं। योजना में पानी बचाने के तरीकों पर पैसा खर्च किया जा रहा है। ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार चाहती है कि मौसम की मार से आपका नुकसान न हो। यह भविष्य की तैयारी है।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की तैयारी

रासासनिक खाद ने जमीन को बंजर बना दिया है। इससे बीमारी भी बढ़ रही है। सरकार अब प्राकृतिक खेती की तरफ लौटना चाहती है। इसमें यूरिया और डीएपी का खर्चा जीरो है। आप गाय के गोबर और गौमूत्र से खाद बनाएंगे। इससे आपकी लागत एकदम कम हो जाएगी। जो पैसा खाद में जाता था वह अब आपकी जेब में रहेगा। प्राकृतिक खेती से उगा अनाज महंगा बिकता है। शहर के लोग इसे खरीदने के लिए ज्यादा दाम देने को तैयार हैं। इससे जमीन की सेहत भी सुधरती है। मिट्टी में केंचुए वापस आते हैं। सरकार प्राकृतिक खेती करने वालों को अलग से इनाम दे रही है। यह आपकी और जमीन की सेहत दोनों के लिए अच्छा है।

दलहन और दूसरी फसलों पर खास ध्यान क्यों

भारत आज भी दालें दूसरे देशों से खरीदता है। हम विदेशों को करोड़ों रुपये देते हैं। सरकार चाहती है कि यह पैसा भारत के किसान को मिले। इसलिए दाल उगाने पर जोर दिया जा रहा है। दाल की फसल जमीन के लिए बहुत अच्छी होती है। यह हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करती है। इससे खाद की जरूरत कम पड़ती है। दलहन की खेती कम पानी में हो जाती है। यह छोटे किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है। सरकार दालों की खरीद की गारंटी दे रही है। तिलहन यानी तेल वाली फसलों पर भी यही नियम लागू है। हम खाने का तेल भी बाहर से मंगाते हैं। सरकार चाहती है कि भारत इसमें आत्मनिर्भर बने। इसका सीधा फायदा आपको मिलेगा।

धन-धान्य कृषि योजना का कुल बजट कितना है

सरकार ने इस योजना के लिए अपनी तिजोरी खोल दी है। इसका कुल बजट ऐतिहासिक है। आज तक किसी भी कृषि योजना पर इतना पैसा एक साथ नहीं लगाया गया। यह बजट दिखाता है कि सरकार खेती को लेकर कितनी गंभीर है। यह सिर्फ कागजों पर लिखा नंबर नहीं है। यह असली पैसा है जो गांव और खेत तक पहुंचेगा। सरकार ने आने वाले सालों के लिए एक बड़ी रकम अलग रख दी है। इसका मतलब है कि पैसों की कमी से काम नहीं रुकेगा। यह बजट देश की जीडीपी में खेती का हिस्सा बढ़ाएगा। सरकार ने बजट बनाते समय हर छोटे खर्चे को जोड़ा है। यह निवेश भारत की खेती की तस्वीर बदल देगा। आप इसे खेती के लिए एक आर्थिक सुरक्षा कवच मान सकते हैं।

हर साल ₹24,000 करोड़ खर्च करने का प्लान

सरकार ने तय किया है कि हर साल 24,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह एक बहुत बड़ी रकम है। यह पैसा एक बार में नहीं बल्कि लगातार खर्च होगा। इससे योजना की रफ्तार बनी रहेगी। हर साल नया फंड आने से नए किसानों को जोड़ा जा सकेगा। अगर किसी साल सूखा या बाढ़ आती है तो भी पैसे की कमी नहीं होगी। यह नियम बनाता है कि सरकारी खजाना किसानों के लिए हमेशा खुला रहे। इस पैसे का हिसाब-किताब बहुत सख्त होगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पैसा सही जगह लगे। हर साल का बजट पहले से तय होने से अधिकारियों को काम करने में आसानी होगी। यह निरंतरता ही इस योजना की असली ताकत है।

यह पैसा किन-किन कामों में लगाया जाएगा

यह पैसा कई अलग-अलग मदों में बंटेगा। इसका एक बड़ा हिस्सा सीधे आपके बैंक खाते में जाएगा। यह नकद मदद के रूप में होगा। दूसरा हिस्सा बुनियादी ढांचे पर खर्च होगा। गांवों में गोदाम और कोल्ड स्टोरेज बनाए जाएंगे। इससे आपकी फसल खराब नहीं होगी। सिंचाई की नई नहरें और पाइपलाइन बिछाई जाएंगी। बिजली के नए कनेक्शन और सोलर पंप पर भी पैसा खर्च होगा। बीज और खाद पर मिलने वाली सब्सिडी इसी बजट से आएगी। मिट्टी की जांच वाली लैब पर भी निवेश किया जाएगा। सरकार नई मंडियां बनाएगी ताकि आपको फसल बेचने के लिए दूर न जाना पड़े। यह पैसा आपकी खेती को आसान और आधुनिक बनाने में लगेगा।

राज्यों को इस योजना में क्या जिम्मेदारी मिलेगी

केंद्र सरकार पैसा देगी लेकिन काम राज्य सरकार को करना होगा। भारत के हर राज्य की मिट्टी और मौसम अलग है। इसलिए राज्यों को अपनी जरूरत के हिसाब से फैसला लेने की छूट दी गई है। राज्य सरकार ही असली लाभार्थियों की पहचान करेगी। गांव के पटवारी और कृषि अधिकारी इसमें अहम भूमिका निभाएंगे। वे ही देखेंगे कि पैसा सही किसान तक पहुंच रहा है या नहीं। अगर कहीं कोई गड़बड़ होती है तो राज्य सरकार उसे ठीक करेगी। राज्यों को यह भी देखना होगा कि उनके यहां कौन सी फसल ज्यादा उगानी चाहिए। केंद्र और राज्य मिलकर काम करेंगे तभी आपको पूरा फायदा मिलेगा। इसे टीम वर्क की तरह चलाया जाएगा।

प्राइवेट कंपनियों की भूमिका क्यों ज़रूरी मानी गई

सरकार जानती है कि वह अकेले सब कुछ नहीं कर सकती। इसलिए प्राइवेट कंपनियों को साथ लिया गया है। इनका काम जमीन हथियाना नहीं बल्कि सुविधा देना है। प्राइवेट कंपनियां नई तकनीक लेकर आती हैं। वे मौसम का सटीक हाल बताने वाले सिस्टम लगाएंगी। वे खेतों में ड्रोन से दवा छिड़कने की सुविधा देंगी। फसल कटने के बाद उसकी ग्रेडिंग और पैकिंग में कंपनियां मदद करेंगी। इससे आपकी फसल का दाम बढ़ जाएगा। कंपनियां फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाएंगी। इससे आपका टमाटर सॉस बनकर बिकेगा और आपको ज्यादा दाम मिलेगा। सरकार ने कंपनियों पर सख्त नियम लगाए हैं। वे सिर्फ सेवा देंगी और किसान मालिक बना रहेगा। यह साझेदारी आपकी तरक्की के लिए है।

100 जिलों का चयन कैसे किया जाएगा

सरकार ने इन जिलों को चुनने के लिए लॉटरी नहीं निकाली है। इसका चयन पक्के आंकड़ों के आधार पर हुआ है। कृषि मंत्रालय ने पिछले पांच साल का रिकॉर्ड देखा है। वेटेरिनरी और मौसम विभाग की रिपोर्ट भी देखी गई है। जिस जिले में खेती पिछड़ रही है उसका नाम लिस्ट में सबसे ऊपर है। चयन पूरी तरह पारदर्शिता से हुआ है। इसमें किसी नेता या सिफारिश का रोल नहीं है। सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया गया है। सरकार ने देखा कि कहाँ पानी सूख रहा है और कहाँ हरियाली कम हो रही है। एक्सपर्ट्स की एक टीम ने जमीन पर जाकर सर्वे किया है। इन सब जांच-पड़ताल के बाद ही अंतिम लिस्ट बनी है। मकसद उन जगहों को चुनना है जहाँ मदद की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

कम उत्पादन वाले जिले क्या होते हैं

कम उत्पादन वाले जिले वे हैं जहाँ मेहनत तो पूरी होती है पर अनाज कम निकलता है। आप पड़ोसी जिले के किसान को देखते हैं। वह उसी बीज और खाद से 10 क्विंटल अनाज उगाता है। आपकी जमीन पर उसी मेहनत से सिर्फ 5 क्विंटल निकलता है। इसे ही कम उत्पादन कहते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। हो सकता है मिट्टी बीमार हो। हो सकता है पानी खारा हो गया हो। कभी-कभी पुराने तरीके भी इसका कारण होते हैं। इन जिलों में प्रति एकड़ कमाई बहुत कम होती है। किसान लागत भी मुश्किल से निकाल पाता है। सरकार ने ऐसे ही जिलों को रेड जोन में रखा है। इन्हीं जिलों को सबसे पहले मदद मिलेगी। लक्ष्य है कि आपकी पैदावार पड़ोसी जिले के बराबर या उससे ज़्यादा हो।

फसल चक्र कमजोर होने का मतलब क्या है

फसल चक्र का मतलब है सही समय पर सही फसल उगाना। जब किसान लालच या मजबूरी में एक ही फसल बार-बार उगाता है तो चक्र टूट जाता है। इसे कमजोर फसल चक्र कहते हैं। जैसे पंजाब में धान और गेहूं का चक्र। इससे जमीन की ताकत खत्म हो जाती है। मिट्टी को सांस लेने का मौका नहीं मिलता। कीड़े और बीमारियों का हमला बढ़ जाता है। कमजोर चक्र वाले जिलों में खाद का खर्चा बहुत बढ़ गया है। वहां बिना दवा के फसल होती ही नहीं है। यह एक खतरनाक स्थिति है। सरकार चाहती है कि आप इस चक्र को तोड़े। आप ऐसी फसलें उगाएं जो जमीन को वापस ताकत दें। सही फसल चक्र ही खेती की लंबी उम्र की गारंटी है।

किसान क्रेडिट कार्ड डेटा क्यों देखा जा रहा है

किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) आपकी आर्थिक सेहत का आईना है। सरकार यह देख रही है कि किस जिले के किसान कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं। अगर किसी जिले में बहुत सारे किसान डिफॉल्टर हो रहे हैं तो वहां समस्या गंभीर है। इसका मतलब है कि वहां खेती में मुनाफा नहीं हो रहा है। बैंक का डेटा झूठ नहीं बोलता। यह बताता है कि किसान पर कर्ज का बोझ कितना है। जिन जिलों में केसीसी का पैसा वापस नहीं आ रहा, उन्हें प्राथमिकता दी गई है। सरकार जानना चाहती है कि पैसा कहां अटक रहा है। क्या फसल खराब हुई या दाम नहीं मिला? इस डेटा के आधार पर ही कर्ज माफी या ब्याज छूट के फैसले होंगे। यह आपकी मदद के लिए किया जा रहा है, जासूसी के लिए नहीं।

हर राज्य से कम से कम एक जिला क्यों चुना गया

भारत बहुत विशाल देश है। कश्मीर की खेती और केरल की खेती बिल्कुल अलग है। राजस्थान की समस्याएं असम से अलग हैं। इसलिए हर राज्य से एक जिला चुनना ज़रूरी था। सरकार चाहती है कि यह योजना पूरे देश का प्रतिनिधित्व करे। अगर सिर्फ एक ही क्षेत्र पर ध्यान दिया जाता तो बाकी नाराज हो जाते। हर राज्य का मौसम और मिट्टी अलग है। सरकार देखना चाहती है कि यह योजना अलग-अलग परिस्थितियों में कैसे काम करती है। यह एक तरह का प्रयोग है। अगर यह मॉडल हर राज्य के एक जिले में सफल हुआ तो इसे पूरे राज्य में लागू करना आसान होगा। यह ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाली बात है। कोई भी राज्य खुद को उपेक्षित महसूस नहीं करेगा।

क्या आगे चलकर और जिले जुड़ सकते हैं

बिल्कुल, यह लिस्ट अंतिम नहीं है। यह तो बस शुरुआत है। सरकार पहले चरण में 100 जिलों पर पूरा जोर लगा रही है। यहाँ से जो सबक मिलेंगे उनका इस्तेमाल आगे किया जाएगा। अगर आपके जिले का नाम अभी नहीं है तो निराश न हों। अगले साल या उसके बाद के चरणों में और जिले जोड़े जाएंगे। यह योजना एक लंबी मैराथन दौड़ की तरह है। सरकार का लक्ष्य अंत में हर उस जिले तक पहुंचना है जहाँ किसान परेशान है। जैसे-जैसे बजट बढ़ेगा, दायरा भी बढ़ेगा। अच्छे प्रदर्शन करने वाले राज्यों को और ज्यादा जिले जोड़ने का मौका मिलेगा। आप इसे एक पायलट प्रोजेक्ट समझ सकते हैं जो सफल होने पर पूरे देश में फैलेगा।

जिला स्तर पर योजना को कैसे लागू किया जाएगा

यह योजना दिल्ली से कंट्रोल नहीं होगी। इसे आपके जिले के मुख्यालय से चलाया जाएगा। जिला कलेक्टर (DM) इसके मुख्य अधिकारी होंगे। उनके पास फैसले लेने की पूरी ताकत होगी। आपको अपनी शिकायत लेकर राजधानी जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जिले में एक विशेष कंट्रोल रूम बनेगा। यहाँ खेती से जुड़े सारे अधिकारी एक छत के नीचे बैठेंगे। इसका मकसद फाइलों को दौड़ाना नहीं बल्कि काम करना है। पैसा सीधे जिले के खाते में आएगा और वहीं से खर्च होगा। इससे काम में तेजी आएगी। अगर आपके जिले में सूखा पड़ता है तो कलेक्टर तुरंत फैसला ले सकेंगे। यह विकेंद्रीकरण का सबसे अच्छा उदाहरण है।

जिला धन-धान्य कृषि समिति क्या करेगी

इस समिति का काम सिर्फ मीटिंग करना नहीं है। यह समिति तय करेगी कि पैसा कहाँ खर्च होना है। इसमें कृषि अधिकारी, बैंक मैनेजर और कृषि वैज्ञानिक शामिल होंगे। सबसे खास बात यह है कि इसमें प्रगतिशील किसानों को भी जगह मिली है। आपकी आवाज समिति तक सीधे पहुंचेगी। यह समिति हर महीने बैठक करेगी। यह देखेगी कि पुराना काम पूरा हुआ या नहीं। नए प्रस्तावों को यही मंजूरी देगी। अगर बीज खराब आया है तो यह समिति एक्शन लेगी। यह समिति आपके और सरकार के बीच का पुल है। इसकी निगरानी में ही सारा बजट खर्च होगा।

ब्लॉक और पंचायत की क्या भूमिका होगी

योजना की असली लड़ाई खेतों में लड़ी जाएगी। इसलिए ब्लॉक और पंचायत सबसे अहम हैं। ग्राम पंचायत ही तय करेगी कि किस किसान को मदद की जरूरत है। ग्राम सभा की बैठक में लाभार्थियों के नाम पढ़े जाएंगे। इससे गलत लोग लाभ नहीं ले पाएंगे। पारदर्शिता पूरी रहेगी। ब्लॉक स्तर के अधिकारी आपके खेत पर आएंगे। वे देखेंगे कि आपने जो दावा किया है वह सच है या नहीं। पंचायत आपको फॉर्म भरने में मदद करेगी। अगर आपको पैसा नहीं मिला तो आप सरपंच से पूछ सकते हैं। यह व्यवस्था गांव के लोगों को ताकतवर बनाती है। गाँव का विकास गाँव के हाथ में है।

स्थानीय फसलों के हिसाब से प्लान कैसे बनेगा

हर जिले की मिट्टी और हवा अलग होती है। इसलिए एक ही प्लान सब जगह नहीं चलेगा। बीकानेर में बाजरा होता है और शिमला में सेब। समिति आपके जिले की मुख्य फसल को देखेगी। उसी हिसाब से योजना बनेगी। अगर आपके यहाँ सरसों ज्यादा होती है तो सरसों के लिए तेल मिल लगाने पर जोर होगा। अगर आप सब्जी उगाते हैं तो कोल्ड स्टोरेज बनेगा। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के वैज्ञानिक इसमें मदद करेंगे। वे बताएंगे कि आपकी मिट्टी के लिए कौन सी नई फसल सही है। यह प्लान ऊपर से थोपा नहीं जाएगा। यह आपकी जरूरतों के हिसाब से तैयार होगा। इसे ‘बॉटम-अप’ अप्रोच कहते हैं।

अलग-अलग विभाग मिलकर कैसे काम करेंगे

अक्सर सरकारी विभागों में तालमेल नहीं होता। बिजली विभाग अलग चलता है और सिंचाई विभाग अलग। इस योजना में सबको एक साथ लाया गया है। अगर कृषि विभाग नलकूप लगाएगा तो बिजली विभाग तुरंत कनेक्शन देगा। सड़क विभाग खेत तक रास्ता बनाएगा। पशुपालन विभाग खाद के लिए मदद करेगा। सभी अधिकारी एक टीम की तरह काम करेंगे। उनकी जवाबदेही तय कर दी गई है। अगर एक विभाग की वजह से काम रुका तो उसे जवाब देना होगा। इससे आपका समय बर्बाद नहीं होगा। आपको अलग-अलग दफ्तरों में अर्जी नहीं देनी पड़ेगी। यह सिंगल विंडो सिस्टम की तरह काम करेगा।

डिजिटल डैशबोर्ड से निगरानी कैसे होगी

सरकार अब फाइलों के भरोसे नहीं है। दिल्ली में बैठे अधिकारी एक क्लिक पर आपके गांव का हाल देख सकते हैं। इसके लिए एक डिजिटल डैशबोर्ड बनाया गया है। यह एक टीवी स्क्रीन जैसा है जिस पर पल-पल की जानकारी आती है। अगर आपके जिले में खाद बंटी है तो वह तुरंत डैशबोर्ड पर दिखेगी। अगर कहीं काम रुका है तो लाल बत्ती जल जाएगी। अधिकारी अब यह नहीं कह सकते कि रिपोर्ट आ रही है। सब कुछ लाइव दिखता है। यह तकनीक झूठ बोलने की गुंजाइश खत्म करती है। इससे काम में देरी नहीं होती। अगर पैसा जारी हुआ है तो वह कहां पहुंचा, यह सब दिखता है। यह एक तरह का सीसीटीवी कैमरा है जो व्यवस्था पर नजर रखता है।

जिलों की रैंकिंग क्यों तय की जाएगी

इंसान की फितरत है कि वह होड़ में अच्छा काम करता है। सरकार ने जिलों के बीच एक प्रतियोगिता शुरू की है। हर महीने जिलों को नंबर दिए जाएंगे। जो जिला सबसे अच्छा काम करेगा उसे ‘नंबर वन’ का खिताब मिलेगा। यह स्कूल के रिपोर्ट कार्ड जैसा है। कलेक्टर और अधिकारी अपनी इज्जत बचाने के लिए मेहनत करेंगे। जो जिला टॉप करेगा उसे इनाम के तौर पर ज्यादा फंड मिलेगा। जो पीछे रह जाएगा उससे जवाब मांगा जाएगा। इससे सुस्त अधिकारी भी दौड़ने लगेंगे। यह रैंकिंग जनता को भी पता होगी। आप देख सकेंगे कि आपका जिला देश में कहां खड़ा है। यह दबाव काम कराने का सबसे अच्छा तरीका है।

किसान ऐप से किसानों को क्या फायदा होगा

अब पूरी सरकार आपकी जेब में है। किसान ऐप आपके लिए एक हथियार है। आपको मौसम का हाल जानने के लिए टीवी का इंतजार नहीं करना है। ऐप पर आपको सटीक जानकारी मिल जाएगी। मंडी के भाव सुबह ही आपके फोन पर आ जाएंगे। आप देख सकते हैं कि किस मंडी में ज्यादा दाम मिल रहा है। योजना के लिए आवेदन भी इसी ऐप से होगा। आपको पटवारी के पीछे भागने की जरूरत नहीं है। अगर आपका पैसा नहीं आया तो आप ऐप पर ही शिकायत कर सकते हैं। यह आपका समय और बस का किराया दोनों बचाता है। अनपढ़ किसान भी इसे आसानी से चला सकें, इसे वैसा बनाया गया है। इसमें बोलकर जानकारी लेने की सुविधा भी है।

योजना में पारदर्शिता कैसे लाई जाएगी

भ्रष्टाचार रोकने का एक ही इलाज है पारदर्शिता। इस योजना में सब कुछ शीशे की तरह साफ है। लाभार्थियों की लिस्ट अब छुपी नहीं रहेगी। इसे पंचायत भवन और ऑनलाइन पोर्टल पर लगाया जाएगा। गांव का कोई भी आदमी देख सकता है कि किसे क्या मिला। पैसा सीधे बैंक खाते में जाएगा (DBT)। हाथ में नकद देने का नियम बंद कर दिया गया है। इससे बिचौलिए खत्म हो गए हैं। जब आप खाद या बीज लेंगे तो रसीद तुरंत आपके फोन पर आएगी। सोशल ऑडिट का भी नियम है। यानी गांव के लोग खुद तय करेंगे कि काम सही हुआ या नहीं। चोरी करने वालों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है।

ड्रोन और नई तकनीक खेती में कैसे मदद करेंगी

खेती अब बैलगाड़ी के जमाने से निकलकर ड्रोन युग में आ गई है। ड्रोन का इस्तेमाल सिर्फ फोटो खींचने के लिए नहीं होगा। यह खेत में दवा छिड़कने का काम करेगा। जो काम करने में आपको दिन भर लगता था, ड्रोन उसे मिनटों में कर देगा। इससे आपकी सेहत भी बची रहेगी क्योंकि जहरीली दवा आपके शरीर पर नहीं गिरेगी। सेटेलाइट से खेत की तस्वीरें ली जाएंगी। इससे पता चलेगा कि फसल में कौन सी बीमारी लग रही है। बीमारी फैलने से पहले ही आपको मैसेज आ जाएगा। मिट्टी में सेंसर लगाए जाएंगे जो बताएंगे कि कब पानी देना है। इससे पानी की बर्बादी रुकेगी। यह तकनीक खेती को मेहनत से ज्यादा दिमाग का काम बना देगी।

एक ही जगह पर कई योजनाओं का लाभ

किसान अक्सर कागजी कार्रवाई में उलझ जाता है। खाद के लिए अलग लाइन है और बीमा के लिए अलग दफ्तर। यह योजना इन सबको एक छत के नीचे लाती है। आपको अब दस जगह भटकने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का पैसा हो या फसल बीमा का क्लेम, सब इसी योजना से जुड़ गया है। यह एक “सुपर स्कीम” की तरह काम करती है। अगर आप इस योजना में पंजीकृत हैं, तो बाकी योजनाओं का लाभ अपने आप मिलेगा। इससे आपका समय बचेगा। अधिकारियों के लिए भी जिम्मेदारी टालना मुश्किल होगा। सरकार ने सिस्टम को सरल बना दिया है। इसका फायदा यह है कि कोई भी लाभ छूटता नहीं है।

बेहतर बीज और आधुनिक खेती के साधन

फसल की नींव बीज होती है। अगर बीज कमजोर होगा तो फसल कभी अच्छी नहीं होगी। सरकार आपको लैब में जांचे हुए उन्नत बीज उपलब्ध कराएगी। ये बीज कम पानी और बदलते मौसम को झेल सकते हैं। सिर्फ बीज ही नहीं, खेती के औजार भी आधुनिक होने चाहिए। ट्रैक्टर, रोटावेटर और सीड ड्रिल जैसी मशीनों पर सरकार भारी सब्सिडी दे रही है। छोटे किसान मिलकर मशीन बैंक बना सकते हैं। यानी मशीन एक खरीदेगा और इस्तेमाल पूरा समूह करेगा। इससे महंगे किराए से मुक्ति मिलेगी। तकनीक अब अमीर किसान की जागीर नहीं रहेगी। यह हर खेत तक पहुंचेगी।

सिंचाई की सुविधा कैसे सुधरेगी

बिना पानी सब सूना है। सरकार का नारा है “हर खेत को पानी”। इसके लिए पुरानी नहरों की मरम्मत की जा रही है। जहाँ नहर नहीं पहुंच सकती, वहां तालाब खोदे जा रहे हैं। सरकार ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर जोर दे रही है। इससे पानी की बचत होती है और फसल भी अच्छी होती है। इसके लिए आपको 90% तक की छूट मिल सकती है। बिजली की दिक्कत दूर करने के लिए सोलर पंप दिए जा रहे हैं। अब आपको रात-रात भर बिजली का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। सूरज की रोशनी से पानी निकलेगा। इससे आपका डीजल और बिजली का बिल जीरो हो जाएगा।

फसल के बाद स्टोरेज की समस्या कैसे खत्म होगी

किसान की सबसे बड़ी मजबूरी है फसल तुरंत बेचना। घर में रखने की जगह नहीं होती और चूहे-कीड़े अनाज खराब कर देते हैं। इस मजबूरी का फायदा व्यापारी उठाते हैं। वे सस्ते में माल खरीदते हैं। इस योजना में गांव के पास ही छोटे गोदाम बनाए जा रहे हैं। आप अपनी फसल वहां सुरक्षित रख सकते हैं। सरकार आपको उस फसल के बदले सस्ता कर्ज भी देती है। जब बाजार में दाम बढ़ें, तब आप फसल बेचें। इसे रोककर रखने की ताकत कहते हैं। यह व्यवस्था आपको बाजार का राजा बनाती है। अब आपको औने-पौने दाम में बेचने की जरूरत नहीं है।

खेती की लागत कम कैसे होगी

मुनाफा तब बढ़ता है जब खर्चा घटता है। यह बिजनेस का उसूल है। आज खेती में खाद और दवा का खर्चा बहुत बढ़ गया है। सरकार सॉइल हेल्थ कार्ड के जरिए इसे कम कर रही है। आपको पता होगा कि खेत में कितनी खाद डालनी है। इससे फालतू खाद का पैसा बचेगा। कस्टम हायरिंग सेंटर से मशीनें किराए पर सस्ती मिलेंगी। आपको लाखों की मशीन खरीदने की जरूरत नहीं है। सोलर पंप से सिंचाई का खर्चा बचेगा। जब हर तरफ से थोड़ी-थोड़ी बचत होगी तो साल के अंत में बड़ी रकम जमा होगी। सरकार चाहती है कि आपकी जेब से कम पैसा निकले और ज्यादा वापस आए।

सही दाम पर फसल बेचने का रास्ता

उगाना आसान है, लेकिन बेचना सबसे मुश्किल काम है। बिचौलिए सारी मलाई खा जाते हैं। यह योजना आपको सीधे बाजार से जोड़ती है। ई-नाम (e-NAM) के जरिए आप अपनी फसल देश की किसी भी मंडी में बेच सकते हैं। अगर आपकी स्थानीय मंडी में भाव कम है, तो आप ऑनलाइन दूसरी जगह सौदा कर सकते हैं। सरकार किसान उत्पादक संघ (FPO) बना रही है। जब 100 किसान मिलकर फसल बेचते हैं, तो उनकी ताकत बढ़ जाती है। कंपनियां खुद आपके पास चलकर आएंगी। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के नियमों को आसान और सुरक्षित बनाया गया है। अब दाम तय करना आपके हाथ में होगा।

सिर्फ खेती नहीं, उससे जुड़े कामों पर भी ध्यान

खेती केवल फसल उगाने तक सीमित नहीं रह गई है। अगर आप सिर्फ अनाज पर निर्भर रहेंगे तो जोखिम बना रहेगा। सरकार चाहती है कि आपके पास कमाई के एक से ज्यादा जरिए हों। यह योजना ‘समन्वित खेती’ को बढ़ावा देती है। इसका मतलब है खेत के साथ-साथ पशुपालन और दूसरे काम भी करना। जब फसल खराब होती है, तब ये काम आपको बचा लेते हैं। यह आपकी आमदनी को सुरक्षित करने का कवच है। सरकार इसके लिए अलग से बजट देती है।

डेयरी और पशुपालन से आमदनी कैसे बढ़ेगी

दूध बेचना रोज की कमाई का जरिया है। फसल का पैसा छह महीने में आता है, लेकिन दूध का पैसा रोज मिलता है। सरकार अच्छी नस्ल की गाय और भैंस खरीदने के लिए लोन देती है। पशु किसान क्रेडिट कार्ड से आपको सस्ता कर्ज मिलता है। सरकार दूध की डेयरियां गांव में ही खुलवा रही है। इससे आपको दूध बेचने शहर नहीं जाना पड़ेगा। पशुओं के लिए डॉक्टर और दवा का इंतजाम भी सरकार कर रही है। यह घर बैठे कमाई का पक्का साधन है।

बकरी और मुर्गी पालन का रोल

बकरी को ‘गरीब की गाय’ कहा जाता है। इसे पालने में खर्चा बहुत कम आता है। यह मुसीबत के समय तुरंत पैसे देती है। मुर्गी पालन भी कम जगह में शुरू हो जाता है। अंडे और मांस की मांग बाजार में हमेशा रहती है। सरकार इनके लिए शेड बनाने का पैसा देती है। जिनके पास जमीन नहीं है, वे इसे आसानी से कर सकते हैं। यह कम समय में मुनाफा कमाने का सबसे तेज तरीका है। इसे महिलाएं घर के काम के साथ आसानी से संभाल सकती हैं।

मधुमक्खी पालन और छोटे व्यवसाय

मधुमक्खी पालन को ‘मीठी क्रांति’ कहा जा रहा है। इससे आपको शहद और मोम मिलता है। मधुमक्खियां आपकी फसल का उत्पादन भी बढ़ा देती हैं। इसके डिब्बे खेतों के किनारे रखे जा सकते हैं। इसके अलावा मशरूम की खेती एक अच्छा विकल्प है। यह कमरे के अंदर भी हो सकती है। सरकार इन छोटे व्यवसायों के लिए ट्रेनिंग और सब्सिडी देती है। यह अतिरिक्त कमाई का बेहतरीन जरिया है। इसमें मेहनत कम और मुनाफा ज्यादा है।

गांवों में नए रोजगार के अवसर

अब रोजगार के लिए शहर भागने की जरूरत नहीं है। इस योजना से गांव में ही काम धंधे खुल रहे हैं। छोटे फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगने से लोगों को नौकरी मिल रही है। दाल मिल और आटा चक्की जैसे काम गांव में शुरू हो रहे हैं। फसल की ग्रेडिंग और पैकिंग के लिए भी लोगों की जरूरत पड़ती है। सरकार चाहती है कि गांव का पैसा गांव में ही रहे। यह गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। इससे पलायन रुकेगा।

युवा किसानों के लिए नए रास्ते

पढ़ा-लिखा युवा खेती को नए नजरिए से देख रहा है। सरकार युवाओं को एग्री-स्टार्टअप शुरू करने के लिए पैसा दे रही है। आप मिट्टी जांच लैब खोल सकते हैं या ड्रोन सर्विस दे सकते हैं। ऑनलाइन मंडी चलाना भी एक नया बिजनेस है। युवा अपनी तकनीक की समझ से खेती को बदल रहे हैं। यह उनके लिए नौकरी ढूंढने के बजाय नौकरी देने का मौका है। खेती अब एक आधुनिक करियर विकल्प बन गई है।

महिला किसानों को इस योजना में क्या मिलेगा

खेती का आधा काम महिलाएं करती हैं। लेकिन जमीन के कागज पर उनका नाम नहीं होता। सरकार इस रिवाज को बदल रही है। अगर जमीन महिला के नाम पर है, तो उसे विशेष लाभ मिलेगा। महिला किसानों को मशीनों पर पुरुषों से ज्यादा सब्सिडी मिलेगी। लोन की ब्याज दर में भी अतिरिक्त छूट दी गई है। सरकार चाहती है कि महिलाएं सिर्फ मजदूर न रहें। उन्हें मालिक बनने का हक मिलना चाहिए। यह योजना महिलाओं के नाम पर जमीन ट्रांसफर करने को प्रोत्साहित करती है। इससे समाज में उनका रुतबा बढ़ेगा। यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ठोस कदम है।

महिला समूहों को कैसे सशक्त किया जाएगा

अकेली महिला कमजोर हो सकती है, लेकिन समूह ताकतवर होता है। सरकार स्वयं सहायता समूहों (SHG) को खेती से जोड़ रही है। अगर 10-12 महिलाएं मिलकर काम करती हैं, तो बैंक उन्हें बिना गारंटी लोन देगा। ये समूह मिलकर खाद्य प्रसंस्करण की यूनिट लगा सकते हैं। अचार, पापड़ या मसालों का बिजनेस शुरू किया जा सकता है। सरकार इनकी ट्रेनिंग और मार्केटिंग का खर्चा उठाएगी। आपकी बनाई चीजें ‘ब्रांड’ बनकर बाजार में बिकेंगी। इससे घर बैठे आमदनी का नया रास्ता खुलेगा। यह आर्थिक आजादी की चाबी है।

युवा किसानों को खेती से जोड़ने की कोशिश

युवा अक्सर खेती को पिछड़ा काम मानते हैं। वे शहर जाकर छोटी नौकरी करना पसंद करते हैं। सरकार खेती को ‘कूल’ और आधुनिक बना रही है। इसमें ड्रोन, सेंसर और ऐप का इस्तेमाल हो रहा है। यह तकनीक युवाओं को आकर्षित करती है। सरकार युवाओं को ‘एग्री-प्रेन्योर’ यानी कृषि उद्यमी बनाना चाहती है। आप खेती से जुड़े स्टार्टअप शुरू कर सकते हैं। सरकार इसके लिए सीड फंड दे रही है। यह नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनने का मौका है। खेती अब एक प्रॉफिटेबल करियर ऑप्शन है।

ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट की सुविधा

सिर्फ पैसा देने से काम नहीं चलता। सही जानकारी भी होनी चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) अब क्लासरूम नहीं, ट्रेनिंग सेंटर बन गए हैं। आपको आधुनिक खेती की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जाएगी। आप मशीन चलाना और उसे ठीक करना सीखेंगे। मशरूम और मोती की खेती जैसे विशेष कोर्स चलाए जा रहे हैं। ट्रेनिंग पूरी होने पर आपको सर्टिफिकेट भी मिलेगा। यह सर्टिफिकेट बैंक लोन लेने में मदद करेगा। सरकार आपके हुनर को निखारना चाहती है। ज्ञान ही असली ताकत है जो आपको आगे ले जाएगा।

विदेश जाकर सीखने का मौका क्यों दिया जा रहा है

दुनिया के कई देश खेती में बहुत आगे हैं। इजराइल रेगिस्तान में खेती करता है। हॉलैंड कम जगह में रिकॉर्ड उत्पादन करता है। सरकार चाहती है कि हमारे किसान वहां जाकर देखें। चयनित प्रगतिशील किसानों को सरकारी खर्चे पर विदेश भेजा जाएगा। यह कोई छुट्टी मनाने की यात्रा नहीं है। यह नई तकनीक सीखने का मिशन है। जब आप वहां की व्यवस्था देखेंगे, तो अपनी सोच बदल पाएंगे। वहां से सीखा हुआ ज्ञान आप अपने गांव में लागू करेंगे। आप दूसरे किसानों के लिए मास्टर ट्रेनर बनेंगे। यह भारतीय खेती को विश्व स्तर पर ले जाने की तैयारी है।

क्या किसानों को आवेदन करना होगा

आपको लंबी लाइनों में लगने की जरूरत नहीं है। सरकार ने प्रक्रिया को बहुत आसान बना दिया है। अगर आप पीएम-किसान सम्मान निधि से जुड़े हैं, तो आपका डेटा सरकार के पास पहले से है। आपको दोबारा रजिस्ट्रेशन नहीं कराना होगा। लेकिन कुछ खास सुविधाओं के लिए आवेदन करना पड़ेगा। जैसे अगर आपको पॉलीहाउस लगवाना है या नई मशीन चाहिए। यह आवेदन भी आप घर बैठे कर सकेंगे। इसके लिए किसी दफ्तर जाने की जरूरत नहीं होगी। आप अपने मोबाइल या नजदीकी सेवा केंद्र से यह काम कर सकते हैं। यह सब कुछ डिजिटल तरीके से होगा।

योजना का लाभ अपने-आप कैसे मिलेगा

सरकार ने सारे डेटा को आपस में जोड़ दिया है। आपका आधार नंबर और बैंक खाता लिंक है। कंप्यूटर सिस्टम खुद पहचान लेता है कि आप पात्र हैं या नहीं। जैसे ही फंड जारी होता है, पैसा सीधे आपके खाते में आ जाता है। मैसेज तुरंत आपके फोन पर आ जाएगा। आपको किसी बाबू के पास फाइल पास कराने नहीं जाना है। यह “ऑटोमैटिक” सिस्टम है। इससे सिफारिश और रिश्वत का खेल खत्म हो गया है। हकदार को उसका हक अपने आप और समय पर मिलता है। तकनीक ने बीच की दीवारों को गिरा दिया है।

कौन-कौन किसान इस योजना के लिए योग्य हैं

भारत का हर वो नागरिक जो खेती करता है, इसका लाभ ले सकता है। आपके पास खेती योग्य जमीन होनी चाहिए। अगर आप बटाईदार हैं, तो भी आप योग्य हैं। इसके लिए आपको बटाई का प्रमाण पत्र देना होगा। छोटे और बड़े दोनों तरह के किसान शामिल हैं। लेकिन कुछ शर्तें भी हैं। अगर आप सरकारी नौकरी करते हैं या इनकम टैक्स भरते हैं, तो आप इसके दायरे में नहीं आएंगे। जो लोग संवैधानिक पदों पर हैं, उन्हें भी बाहर रखा गया है। यह योजना सिर्फ उन लोगों के लिए है जिनकी रोजी-रोटी खेती पर निर्भर है।

छोटे और सीमांत किसानों को क्या खास फायदा

जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है, वे इस योजना के असली हीरो हैं। सरकार जानती है कि उनके पास निवेश करने के लिए पैसा कम होता है। इसलिए उन्हें सब्सिडी ज्यादा मिलती है। मशीनों की खरीद पर उन्हें 80 प्रतिशत तक छूट मिल सकती है। लोन मिलने में बैंकों को निर्देश है कि छोटे किसानों को पहली प्राथमिकता दें। बीमा का प्रीमियम भरने में भी उन्हें राहत दी गई है। सरकार का हाथ सबसे पहले कमजोर साथी को पकड़ता है। यह असमानता को दूर करने की कोशिश है।

जरूरी दस्तावेज कौन-कौन से होंगे

कागज तैयार रखना हमेशा समझदारी का काम है। सबसे जरूरी दस्तावेज आपका आधार कार्ड है। दूसरा अहम कागज जमीन की जमाबंदी या खसरा-खतौनी है। यह साबित करता है कि आप किसान हैं। बैंक पासबुक की साफ कॉपी तैयार रखें। एक पासपोर्ट साइज फोटो भी अपने पास रखें। आपका मोबाइल नंबर आधार से लिंक होना बहुत जरूरी है। सारे मैसेज उसी पर आएंगे। अगर आप जाति प्रमाण पत्र लागू होता है, तो उसे भी अपडेट करा लें। बस इतने ही कागजों की जरूरत पड़ेगी। प्रक्रिया को जानबूझकर सरल रखा गया है।

अभी आवेदन क्यों शुरू नहीं हुआ

अभी यह योजना लॉन्च होने के बिल्कुल करीब है। सरकार इसके ऑनलाइन पोर्टल की टेस्टिंग कर रही है। वे नहीं चाहते कि भारी भीड़ के कारण वेबसाइट क्रैश हो जाए। नियमों की बारीकियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जिला स्तर पर अधिकारियों को ट्रेनिंग दी जा रही है। जल्दबाजी में अक्सर गड़बड़ हो जाती है। इसलिए सरकार पूरी तैयारी के बाद ही आवेदन की खिड़की खोलेगी। यह छोटा सा इंतजार आपके फायदे के लिए ही है। ताकि जब आप आवेदन करें, तो आपको कोई तकनीकी दिक्कत न आए। बहुत जल्द ही तारीख का ऐलान कर दिया जाएगा।

योजना की निगरानी कौन करेगा

इस योजना की निगरानी के लिए तीन स्तर का मजबूत पहरा लगाया गया है। सबसे ऊपर दिल्ली में बैठा कृषि मंत्रालय है। उसके नीचे राज्य सरकार और फिर जिला प्रशासन है। यह त्रि-स्तरीय (three-tier) सिस्टम है। इसमें किसी एक व्यक्ति की मनमानी नहीं चलेगी। एक स्वतंत्र एजेंसी भी बनाई गई है जो बाहर से सब कुछ देखेगी। इसका काम निष्पक्ष रिपोर्ट देना है। निगरानी का मकसद किसी को डराना नहीं है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पैसा सही जगह पहुंच रहा है। अगर कहीं लीकेज है तो उसे तुरंत बंद किया जाएगा। यह सिस्टम आपकी गाढ़ी कमाई के टैक्स के पैसे की रक्षा करता है।

केंद्र और राज्य स्तर की टीमों की भूमिका

केंद्र सरकार “इंजन” की तरह काम करती है और राज्य सरकार “पटरियों” की तरह। केंद्र की टीम नीति बनाती है और फंड जारी करती है। वे सैटेलाइट डेटा और ऑनलाइन पोर्टल के जरिए नजर रखते हैं। राज्य स्तर की टीम का काम योजना को जमीन पर उतारना है। वे स्थानीय जरूरतों के हिसाब से नियम बनाते हैं। दोनों टीमों के बीच लगातार संवाद होता है। अगर राज्य को फंड की कमी होती है तो केंद्र तुरंत मदद भेजता है। केंद्र की टीम कभी भी औचक निरीक्षण (surprise visit) के लिए आ सकती है। यह डर अधिकारियों को चुस्त रखता है। दोनों का तालमेल ही योजना की सफलता की चाबी है।

जिला अधिकारी क्या जिम्मेदारी निभाएंगे

जिला अधिकारी (DM या कलेक्टर) इस मिशन के कप्तान हैं। आपके जिले में योजना सफल होगी या फेल, यह उन्हीं पर निर्भर करता है। उनके पास पावर भी है और जिम्मेदारी भी। वे हर हफ्ते कृषि अधिकारियों और बैंक मैनेजरों के साथ बैठक करेंगे। अगर आपको बैंक लोन देने में आनाकानी करता है, तो कलेक्टर सीधे कार्रवाई कर सकते हैं। वे शिकायतों का निपटारा तुरंत करेंगे। जिले के लक्ष्यों को पूरा करना उनका काम है। वे यह भी देखेंगे कि बीजों और खाद की कालाबाजारी न हो। आप उन्हें इस योजना का सबसे बड़ा संरक्षक मान सकते हैं।

समय-समय पर समीक्षा क्यों ज़रूरी है

गलती किसी से भी हो सकती है, लेकिन उसे समय रहते सुधारना जरूरी है। समीक्षा का मतलब है पीछे मुड़कर देखना कि क्या खोया और क्या पाया। हर तीन महीने में योजना का रिपोर्ट कार्ड बनता है। इससे पता चलता है कि कौन सा फैसला सही था और कौन सा गलत। अगर किसी नियम से किसानों को दिक्कत हो रही है, तो समीक्षा के बाद उसे बदला जा सकता है। यह योजना को लकीर का फकीर बनने से रोकती है। समीक्षा से योजना में लचीलापन आता है। यह सुनिश्चित करता है कि 5 साल बाद पछताना न पड़े। सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।

जमीन पर जाकर हालात कैसे देखे जाएंगे

अब रिपोर्ट एसी कमरों में बैठकर नहीं बनेगी। अधिकारियों को अपने जूते गंदे करने होंगे। उन्हें खेत की मेड़ तक जाना होगा। इसे “फिजिकल वेरिफिकेशन” कहते हैं। अधिकारी आपके पास आएंगे और पूछेंगे कि पैसा मिला या नहीं। वे काम की फोटो खींचकर जीपीएस लोकेशन के साथ अपलोड करेंगे। इससे फर्जीवाड़ा रुकता है। कागज पर तालाब खुदवाना आसान है, लेकिन जमीन पर दिखाना होगा। सोशल ऑडिट में गांव के लोग भी अधिकारियों के साथ रहेंगे। आपकी गवाही ही सबसे बड़ा सबूत होगी। यह हकीकत जानने का सबसे पक्का तरीका है।

इस योजना के सामने आने वाली मुश्किलें

हर अच्छे काम में बाधाएं आती हैं। इस योजना के सामने भी चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी समस्या गांवों में इंटरनेट की है। कई जगह नेटवर्क कमजोर होने से ऐप काम नहीं करते। दूसरी चुनौती नौकरशाही की सुस्ती है। अगर अधिकारी समय पर फाइल आगे नहीं बढ़ाते, तो आपको इंतजार करना पड़ता है। मौसम की अनिश्चितता भी एक बड़ा जोखिम है। अचानक आई बाढ़ या सूखा सारी प्लानिंग खराब कर सकती है। छोटे खेतों के कारण मशीनों का इस्तेमाल मुश्किल होता है। पुराने रीति-रिवाजों को छोड़ना भी आसान नहीं होता। हमें इन सच्चाईयों को स्वीकार करना होगा।

जागरूकता की कमी एक बड़ी समस्या क्यों

योजना कितनी भी अच्छी हो, अगर आपको पता नहीं तो वह बेकार है। गांवों में सही जानकारी नहीं पहुंच पाती। अक्सर आप सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा कर लेते हैं। इससे अफवाहें फैलती हैं। बिचौलिए इसी अज्ञानता का फायदा उठाते हैं। वे आपसे फॉर्म भरने के पैसे मांगते हैं जो कि मुफ्त है। कई बार किसान डर के मारे आवेदन नहीं करते। उन्हें लगता है कि जमीन सरकार ले लेगी। यह डर जानकारी की कमी से आता है। जब तक आप जागरूक नहीं होंगे, अपना हक नहीं मांग पाएंगे। जानकारी ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।

तकनीकी जानकारी की कमी कैसे दूर होगी

ड्रोन और ऐप का नाम सुनकर घबराहट होती है। यह स्वाभाविक है। लेकिन इसका समाधान मौजूद है। आपके घर की नई पीढ़ी इसमें अहम रोल निभाएगी। आपके बच्चे स्मार्टफोन चलाना जानते हैं। वे आपको सिखा सकते हैं। सरकार गांव-गांव में ‘कृषि मित्र’ तैनात कर रही है। इनका काम आपको तकनीक सिखाना है। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जाएगी। वहां आप खुद मशीन चलाकर देख सकते हैं। सरकार ने ऐप को बहुत आसान बनाया है। इसमें चित्रों और आवाज का इस्तेमाल किया गया है। आपको पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है। बस सीखने की ललक होनी चाहिए।

क्या योजना हर जिले में बराबर सफल होगी

सच यह है कि नतीजे हर जगह एक जैसे नहीं होंगे। जिन जिलों में पहले से नहरें और सड़कें हैं, वे जल्दी दौड़ेंगे। पिछड़े जिलों को रफ्तार पकड़ने में वक्त लगेगा। यह वहां के प्रशासन की चुस्ती पर निर्भर करता है। अगर आपके जिले का कलेक्टर सक्रिय है, तो काम तेजी से होगा। जहां पंचायतें जागरूक हैं, वहां भ्रष्टाचार नहीं टिकेगा। स्थानीय राजनीति भी असर डालती है। लेकिन सरकार का फोकस कमजोर जिलों पर ज्यादा है। वहां ज्यादा संसाधन भेजे जा रहे हैं। सफलता की रफ्तार अलग हो सकती है, लेकिन दिशा एक ही रहेगी। अंत में, जिस जिले का किसान ज्यादा सक्रिय होगा, वही बाजी मारेगा।

आने वाले 5–10 साल में खेती पर असर

अगले एक दशक में खेती की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। खेती अब बैल और हल तक सीमित नहीं रहेगी। आप देखेंगे कि खेतों के ऊपर ड्रोन उड़ रहे हैं। पानी की एक-एक बूंद का हिसाब रखा जाएगा। रसायनों का इस्तेमाल बहुत कम हो जाएगा। खेती एक तकनीकी काम बन जाएगा। जो आज मोबाइल चलाना जानता है, कल वह खेती का मास्टर होगा। मौसम का डर खत्म हो जाएगा क्योंकि तकनीक पहले ही चेतावनी दे देगी। 5 साल बाद खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि मुनाफे का बिजनेस होगी। युवा इसे मजबूरी में नहीं, बल्कि शौक से चुनेंगे।

किसानों की जिंदगी में क्या बदलाव आ सकता है

सबसे बड़ा बदलाव आपकी जेब और आपके आत्मविश्वास में आएगा। आप कर्ज के दुष्चक्र से बाहर निकल जाएंगे। आपको साहूकार के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे। आपके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ेंगे। पक्का मकान अब सपना नहीं हकीकत होगा। आप अपनी फसल का दाम खुद तय करेंगे। समाज में किसान का रुतबा बढ़ेगा। लोग आपको ‘अन्नदाता’ के साथ-साथ ‘सफल उद्यमी’ भी मानेंगे। बीमारी या बुढ़ापे की चिंता कम होगी क्योंकि आपके पास बचत होगी। यह योजना आपको एक सम्मानजनक जीवन जीने का आधार देगी।

गांवों की अर्थव्यवस्था कैसे मजबूत होगी

जब किसान की जेब में पैसा आता है, तो पूरा गांव तरक्की करता है। गांव के बाजार गुलजार हो जाएंगे। ट्रैक्टर मैकेनिक से लेकर कपड़े की दुकान तक, सबका धंधा चलेगा। गांवों में छोटे उद्योग लगेंगे। लोग शहर से पैसा कमाने गांव वापस आएंगे। जमीन की कीमतें बढ़ेंगी। बैंक और एटीएम गांवों में अपनी शाखाएं बढ़ाएंगे। गांव अब सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनेंगे। पलायन रुकेगा क्योंकि रोजगार घर के पास मिलेगा। एक समृद्ध किसान ही समृद्ध गांव की नींव है।

देश की खाद्य सुरक्षा पर इसका प्रभाव

भारत की आबादी बढ़ रही है और खेत कम हो रहे हैं। यह योजना सुनिश्चित करेगी कि देश का पेट हमेशा भरा रहे। हम दाल और तेल के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहेंगे। भारत अपने अनाज से दुनिया का पेट भरेगा। गोदाम कभी खाली नहीं होंगे। सबसे बड़ी बात, हमें जहर मुक्त और शुद्ध खाना मिलेगा। कुपोषण की समस्या खत्म होगी। जब देश के पास अपना भोजन होता है, तो वह किसी के सामने झुकता नहीं है। यह भारत की संप्रभुता को मजबूत करेगा।

आत्मनिर्भर भारत से इस योजना का रिश्ता

आत्मनिर्भर भारत का सपना किसान के बिना अधूरा है। जब आप अपने पैरों पर खड़े होंगे, तभी देश खड़ा होगा। आज हम हजारों करोड़ का खाने का तेल बाहर से मंगाते हैं। यह योजना उस पैसे को बचाएगी। वह पैसा देश के विकास में लगेगा। हम दुनिया से खरीदने वाले नहीं, बल्कि दुनिया को बेचने वाले बनेंगे। यह योजना ‘मेक इन इंडिया’ को खेतों तक ले जाती है। आपका उगाया हुआ अनाज ‘ब्रांड इंडिया’ बनकर विदेशों में बिकेगा। आप ही भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाएंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या मुझे इस योजना के लिए अलग से बैंक खाता खुलवाना होगा

नहीं। आपको नया खाता खुलवाने की जरूरत नहीं है। आपका पुराना बैंक खाता ही काम करेगा। बस एक शर्त है। वह खाता आपके आधार नंबर से जुड़ा होना चाहिए। अगर आपका खाता ‘जन-धन योजना’ वाला है तो वह भी मान्य है। सरकार पैसा डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के जरिए भेजती है। इसके लिए आधार लिंक होना जरूरी है। अगर लिंक नहीं है तो बैंक जाकर आज ही करवा लें।

अगर मेरे पास स्मार्टफ़ोन नहीं है तो मैं आवेदन कैसे करूँ

चिंता की कोई बात नहीं है। सरकार ने इसके लिए ऑफलाइन सुविधा भी दी है। आप अपने गांव के ‘कॉमन सर्विस सेंटर’ (CSC) पर जा सकते हैं। वहाँ मौजूद सहायक आपका फॉर्म भर देगा। आप ग्राम पंचायत के कार्यालय में जाकर भी मदद ले सकते हैं। वहां ‘कृषि मित्र’ आपकी सहायता के लिए तैनात हैं। तकनीक सुविधा के लिए है। इसे रुकावट न समझें।

क्या किराये की जमीन पर खेती करने वाले को लाभ मिलेगा

हाँ, बिल्कुल मिलेगा। सरकार जानती है कि बहुत से किसान दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं। उन्हें बटाईदार कहते हैं। आपको बस जमीन मालिक के साथ हुए समझौते का कागज दिखाना होगा। अगर लिखित समझौता नहीं है तो पंचायत से लिखवाकर दे सकते हैं। सरपंच की गवाही मान्य होगी। यह योजना मेहनत करने वालों के लिए है। सिर्फ जमीन मालिकों के लिए नहीं।

आवेदन करने के कितने दिन बाद पैसा आएगा

जब आप आवेदन जमा करते हैं तो उसकी जांच होती है। इसमें आमतौर पर 15 से 30 दिन का समय लगता है। जैसे ही आपका आवेदन मंजूर होगा, आपके फोन पर मैसेज आ जाएगा। उसके अगले 7 दिनों के भीतर पैसा आपके खाते में पहुंच जाएगा। आप ऐप पर अपने आवेदन की स्थिति (स्टेटस) देख सकते हैं। सरकार की कोशिश है कि आपको लंबा इंतजार न करना पड़े।

क्या यह पैसा मुझे वापस सरकार को देना होगा

यह सवाल बहुत से किसानों के मन में है। इसका जवाब है – नहीं। यह कोई लोन या कर्ज नहीं है। यह सरकार की तरफ से दी गई आर्थिक मदद (अनुदान) है। यह पैसा आपकी तरक्की के लिए है। आपको इसे कभी भी वापस नहीं चुकाना है। लेकिन अगर आपने केसीसी (क्रेडिट कार्ड) पर लोन लिया है, तो वह बैंक का नियम है। यह योजना पूरी तरह से मुफ्त सहायता है।

क्या मैं पीएम-किसान और इस योजना का लाभ एक साथ ले सकता हूँ

हाँ, आप दोनों का लाभ ले सकते हैं। पीएम-किसान सम्मान निधि अलग योजना है। धन-धान्य कृषि योजना अलग है। एक योजना आपके खाते में नकद पैसा डालती है। दूसरी योजना आपको खेती के संसाधन और तकनीक देती है। दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं। अगर आप पीएम-किसान के लाभार्थी हैं तो आपको इस योजना में प्राथमिकता मिलेगी। सरकार आपको हर तरफ से मजबूत करना चाहती है।

अगर मेरे खाते में पैसा नहीं आया तो शिकायत कहाँ करूँ

अगर समय पर पैसा नहीं मिलता है तो चुप न बैठें। सरकार ने इसके लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। आप 155261 पर कॉल कर सकते हैं। यह कॉल पूरी तरह मुफ्त है। आप अपनी शिकायत किसान ऐप पर भी दर्ज कर सकते हैं। हर जिले में एक शिकायत निवारण अधिकारी बैठा है। आप सीधे डीएम ऑफिस में भी जा सकते हैं। आपकी सुनवाई जरूर होगी।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना: कुल मिलाकर क्या बदलेगा

इस योजना से खेती की सूरत बदलने वाली है। अब किसान सिर्फ मौसम के भरोसे नहीं रहेगा। उसके पास तकनीक और सरकार का साथ होगा। सबसे बड़ा बदलाव आपकी सोच में आएगा। खेती अब घाटे का सौदा नहीं बल्कि मुनाफे का बिजनेस बनेगी। गांवों में खुशहाली वापस आएगी। जब जेब में पैसा होता है, तो चेहरे पर चमक अपने आप आ जाती है। पलायन रुकेगा। युवा अब शहर की नौकरी छोड़कर गांव में खेती को करियर बनाएंगे। यह योजना किसान को लाचारी से निकालकर आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएगी। यह सिर्फ एक योजना नहीं, एक नया सवेरा है।

क्या यह योजना सच में किसानों के काम आएगी

कागज पर योजनाएं बहुत बनती हैं, लेकिन यह अलग है। इसमें समस्या की जड़ पर वार किया गया है। यह आपको मछली नहीं देती, मछली पकड़ना सिखाती है। लागत कम करना और दाम बढ़ाना ही इसका मंत्र है। जब खाद सस्ती मिलेगी और फसल महंगी बिकेगी, तो फायदा होना तय है। बिचौलियों का हट जाना ही सबसे बड़ी जीत है। सीधा पैसा खाते में आने से लीकेज बंद हो गई है। यह योजना हवाई वादे नहीं करती। यह जमीन पर काम करती है। इसका डिजाइन ही ऐसा है कि यह हर किसान की मदद करे। चाहे वह छोटा हो या बड़ा।

किसानों के लिए आगे का रास्ता

रास्ता साफ है, बस आपको कदम बढ़ाना है। पुरानी लकीर पीटना छोड़ना होगा। नई तकनीक को गले लगाना होगा। डरिए मत, शुरुआत में हर नई चीज मुश्किल लगती है। मोबाइल ऐप का इस्तेमाल सीखिए। मिट्टी की जांच करवाइए। जो फसल बाजार मांग रहा है, उसे उगाइए। पड़ोसी क्या कर रहा है, यह मत देखिए। यह देखिए कि आपके लिए क्या सही है। बदलाव का विरोध करने के बजाय उसका हिस्सा बनें। जो समय के साथ बदलता है, वही आगे बढ़ता है। सरकार ने दरवाजा खोला है, अंदर आपको ही जाना होगा।

सरकार और किसानों की साझी जिम्मेदारी

ताली एक हाथ से नहीं बजती। सरकार ने पैसा और संसाधन दे दिया है। अब ईमानदारी दिखाने की बारी आपकी है। सब्सिडी का गलत इस्तेमाल न करें। जो मशीन किराए के लिए ली है, उसे खुद तक सीमित न रखें। अगर कहीं गड़बड़ दिखे तो आवाज उठाएं। गलत जानकारी देकर लाभ न लें। यह देश का पैसा है, यानी आपका पैसा है। इसे बर्बाद होने से बचाना आपका धर्म है। सरकार को भी अपनी सुस्ती छोड़नी होगी। अधिकारियों को जवाबदेह बनना होगा। जब दोनों पहिए साथ चलेंगे, तभी विकास की गाड़ी दौड़ेगी। यह साझेदारी ही सफलता की गारंटी है।

भारतीय खेती के भविष्य की नई शुरुआत

हम एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं। भारत अब दुनिया का ‘फूड बास्केट’ बनने जा रहा है। हमारी खेती अब रसायनों से मुक्त और तकनीक से युक्त होगी। आने वाला समय स्मार्ट फार्मिंग का है। ड्रोन, सेंसर और सैटेलाइट आम बात हो जाएंगे। भारत का किसान वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनाएगा। हमारी दालें, मसाले और फल दुनिया भर की रसोई में पहुंचेंगे। यह आत्मविश्वास की नई लहर है। हम फिर से ‘सोने की चिड़िया’ बन सकते हैं। इसकी शुरुआत आपके खेत से हो चुकी है। भविष्य उज्ज्वल है और सुरक्षित भी।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना एक क्रांतिकारी कदम है। यह किसान के आंसू पोंछने और उसे ताकत देने का प्रयास है। इसमें चुनौतियों का हल भी है और भविष्य का रोडमैप भी। यह योजना बताती है कि सरकार किसान के साथ खड़ी है। मकसद साफ है – किसान सुखी तो देश सुखी। आपको बस जागरूक रहना है और सुविधाओं का लाभ उठाना है। यह बदलाव का समय है। अपनी मेहनत और सरकार के सहयोग से आप नई कहानी लिखेंगे। जीत आपकी होगी, जीत देश की होगी।

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